संत गुरु रबिदास जयंती का इतिहास, जाने 2021 में कब है जयंती?(SANT GURU RABIDAS JAYANTI HISTORY IN 2021)

 लेखक: गुड्डू राय    

संत गुरु रबिदास जयंती का इतिहास, जाने 2021 में कब है जयंती?(SANTसंत गुरु रबिदास जयंती का इतिहास, जाने 2021 में कब है जयंती?(SANT GURU RABIDAS JAYANTI HISTORY IN 2021) GURU RABIDAS JAYANTI HISTORY IN 2021)

 

 

भारत हमेसा से अपने वीरो के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है| भारत में समय समय पर ऐसे ऐसे महापुरुष ने जन्म लिया है,जो भारत में फैले कई तरह के बुरइयो और अन्ध्विस्वसो को खत्म करने में अपना योगदान दिया है| सतं गुरु रबिदास भी ऐसे ही एक महान व्यक्ति थे जिन्होंने अपने पदों के द्वारा भारत में फैले अन्ध्विस्वासो और भेद-भाव को दूर करनेकी कोसिस की और सफल भी हुए| वे एक समाज सुधारक थे, जिन्हें लोग बहुत पसंद करते थे,जिनके पदों को लोग पढना चाहते थे| लोगो का यही मानना था की गुरू रबिदास जी भगवान का रूप लेके धरती में पधारे है,और समाज में फैले बुराइयों को दूर करने की कोसिस की| आज हमलोग संत गुरु रबिदास जयंती का इतिहास जाने 2021 में कब है जयंती?(SANT GURU RABIDAS JAYANTI HISTORY IN 2021) के बारे में जानेंगे|

Table of Contents

संत रबिदास कौन है?(Who is Rabidas?)

संत रबिदास जी 15-16 वी सताब्दी के एक महान दार्सनिक,समाज सुधारक,कवि,रचयिता,और लोगो के अनुसार इस्वर के अनुयाई थे| वे भक्तिकाल(1375 B.C{BEFORE CHRIST} -1700 B.C) के कवि थे, इन्हें कबीर के समकालीन कहा जाता था| रबिदास जी उन चुनिन्दा महापुरुषों में से एक है,जिन्होंने अपने रूहानी वचनों से सरे संसार को एकता और भाई चारा के रूप में बंधने कली कोसिस की| इहोने जीवन भर समाज में फैली कुरीति जैसे जात-पात के अंत के लिए काम किया| इनके सेवक इहने सतगुरु,जगतगुरु आदि नामो से बुलाकर इनका सत्कार करते थे| ये जाट के मोची थे,और जुटे बनाने का कार्य करते थे| वे अपना काम पूरी परिश्रम तथा लगन से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे| संत रामानंद के शिष्य रबिदास ने अध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया,वे हमेसा प्रसन्न रहते थे और मुश्काराते रहते थे| उनके अध्यात्मिक गुरु कबीर साहेब जी थे|
 

संत रबिदास जयंती 2021(RABIDAS JAYANTI 2021):

भारत में इस महान व्यक्ति का जन्म दिवस के मौके पर उनका जयंती मनाया जाता है| भारत में 27 फ़रवरी 2021 को इनका 643 वा जन्मदिवस मनाया जाएगा| इस दिन इनके श्रद्धालुनदी में डूबकी लगाते है,और उनकी पूजा अर्चना करते है, 
 
इस दिन अमृतवाणी गुरु रबिदास को पढ़ी जाती हैओर गुरु चित्र के साथ गाँव गाँव में श्री रैदास के चित्र के साथ कीर्तन जुलुस निकाला जाता है,हर वर्ष श्री गुरु रबिदासके जन्म थान मंदिर सीर गोवार्धर्ण,वारणसी में भव्य उत्सव के अवसर पर दुनिया भर से लाखो श्रद्धालु आते है|
 

 गुरु रबिदास जी की जवनि(GURU RABIDAS BIOGRAPHY AND HISTORY):

नाम(NAME)

श्री गुरु रबिदास

माता का नाम (MOTHER NAME)

कमला देवी जी

पिता का नाम (FATHER NAME)

संतोष दस जी

जन्म(BIRTH)

1377 A.D(अर्थात विक्रम संवत माघ सुदी 1433,हालाँकि कुछ लोगो का मानना है की ये 1440 A.D था)

आयु

120-126 वर्ष (सरीर त्यागने तक/अनुमानतः)

जन्म स्थान(BIRTH PLACE)

 सीर,गोवर्धनपुर वाराणसी,यु पी

पत्नी का नाम(WIFES NAME)

लोनाजी

पेशा (OCCUPATION)

लेखक,कवि

शैली/भाषा

ब्ब्रजभाषा

बच्चे(CHILDREN)

विजय दस जी

 

 

 

 

 

अरम्भिक जीवन(STARTING LIFE)

संत कबी रबिदास का जन्म माघ महीने में पूर्णिमा(माघ पूर्णिमा) के दिन रविवार 1377 A.D (अर्थात विक्रम संवत माघ सुदी 1433 हालाँकि कुछ लोगो का मानना है की ये 1440 A.D) को सीर,गोवर्धनपुर वाराणसी,यु पी में हुआ था| इनके पिता का नाम संतोक दास जी और माता का नाम कमला देवी था| इनके दादा का नाम कालूराम जी और इनकी दादी का नाम लखपति बताया जाता है|  एक पौराणिक कथा के अनुसार,रबिदास जी पिछले जन्म में एक ब्राह्मण थे|  अपनी मृत्युसैया पर वह चमार जाती की एक महिला की और आकर्षित हो गए,और उन्होंने उस खुबसूरत महिला को अपनी माँ बनाने की कामना की| मृत्यु के बाद उन्होंने उसी स्त्री के गर्भ से रबिदास जी के रूप में पुर्नजन्म लिया| इनके जन्म स्थान को श्री गुरु रबिदास जन्म स्थान के नाम से जाना जाता है|
 
रैदास कबीर के समकालीन भक्तिकालीन कवि थे | इनकी प्रसिद्धि से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था|  मध्ययुगीन साधको में रैदास का विशिष्ट स्थान रहा है|  कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के प्रमुख कवियों में विशिष्ट स्थान रखते है| 
 
रैदास के पिता नगर राज्य के सरपंच हुआ करते थे| उनका जूता बनाने का काम था| गुरू रबिदास समाज सुधारक के रूप में भी जाना जाता है| उनकी पिता मरे हुए जानवरों की खाल निकलकर उससे चमरे बनाते थे,और उसी से चप्पल बनाते थे| रबिदास जी बचपन से ही अच्छे स्वभाव के थे और अत्यंत बहादुर भी थे| उन्हें भेद भाव का समना करना परा, उच्च कुलो के बच्चो  द्वारा| उन्होंने स्कूलों में भी नीच जाती होने का अहसास दिलाया जाता था,और निचा दिखाने की कोसिस की जाती थी| उन्होंने अपने ऊपर हुए अत्याचारों का विरोध करने के लिए कलम का सहारा लिया| अपनी रचनाओ से समाज को सुधारने का प्रयाश किआ,और यही से उनके महान होने का सफ़र सुरु हुआ| 

  रबिदास जी की सिक्षा(EDUCATION OF RABIDAS JI):

 संत रैदास बचपन से ही अच्छे स्वभाव के थे| उन्होंने एक छोटे जाती के घर में जन्म लिया था,जिनके कारण उन्हें भेद भाव का सामना करना परा था| सुरुवाती दिनों में उन्होंने बचपन में अपने गुरु पण्डित सारदा नन्द की पाठशाला में सिक्षा ग्रहण करना सुरु किआ| उनके पाठशाला में उची जाती के लोगो के बच्चे भी सिक्षा ग्रहण करने आते थे अतः उन लोगो के द्वारा संत रबिदास जी को प्रतारित किया जाता था,जिनके कारण उन्हें बाध्य होकर पढाई चोरनी पारी| उनके शिक्षक पण्डित सारदा नन्द उच नीच और भेद भाव कलो नहीं मानते थे|

 
बाल्यकाल के रबिदास के व्यवहार को देखकर पण्डित शारदा नन्द को आभाष हो गया था की ये आम बालक नहीं है और ये बरा होकर बहुत महान व्यक्ति बनेगा| पण्डित जी ने उन्हें खुद जाकर उनके घर में सिक्षा का ज्ञान देना सुरु किया| वह बचपन से ही एक होनहार छात्र थे,उनके शिक्षक उन्हें जितना पढाते थे,रबिदास जी उनसे ज्यादा समझ लेते थे| शिक्षक सरदा नन्द काफी उनसे प्रभावित हुए| रबिदास को देखकर वह मन ही मन सोचते थे की वह एक बरा समाज सुधारक बनेगा |   

संत रबिदास का वैवाहिक जीवन(MARIED LIFE OF RABIDAS JI):

संत रबिदास का विवाह लोना नाम की लार्की से हुआ था| प्रारंभ से ही रबिदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दुसरो की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था| साधू संतो की सहायता करने में उन्हें विसेस आनंद आता था|और वे प्राय उन्हें बिना मूल्य के जुटे भेंट कर देते थे| उनके इस स्वभाव से अप्रसन्न होकर रबिदास के पिता ने उनको था उनकी पत्नी को घर से भगा दिया| वे परोस में ही एक ईमारत बनाकर बरी तत्परता के साथ अपना व्यवसाय करने लगे तथा बचे समय में साधू संतो के सत्संग तथा इश्वर भजन में व्यतीत करने लगे| रैदास और लोना के वैवाहिक जीवन का फल एक पुत्र के रूप में उन्हें मिला जिनका नाम विजय दास जी उन्होंने रखा|  रैदास ने उंच-नीच की भावना तथा इश्वर भक्ति के नाम पर किए जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको प्रेमपूर्ण मिलजुल कर रहने का आदेश दिया|  
 

रबिदास जी का आगे का जीवन(SANT RABIDAS LIFE HISTORY):

संत रबिदास भक्तिकाल के जाने माने कवियों में से एक मने जाते है| उन्हें संत कबीर के समकालिन कहा जाता था|भगवान राम के प्रति उनका भक्ति बढती गई| उनके मुह से हमेसा राम-राम, रघुनाथ,राजा रामचंद्र,कृष्णा,हरी,गोबिंद,आदि शब्दों का उपयोग करते रहते थे|  इससे उनकी धार्मिकता का प्रमाण हमें इन पदों से मिलता है: 
                     कृष्ण,करीम,राम,हरी,राघव,जब लग एक ने पेखा,
                      वेद,कतेब,कुरान,पुरानन,सहज ,एक नहीं देखा,  
                       चारो वेद के करे खंदौत| जन रैदास करे दंदौती||
 
कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के प्रमुख कवियों में विशिष्ट स्थान रखते है| कबीर दस जी ने इन्हें संतन के रबिदास कहकर इन्हें मान्यता दी| मूर्तिपूजा,तिर्थ्पुजा आदि जैसे दिखावे में वे बिलकुल भी विस्वास नहीं करते थे|वह लोगो की आतंरिक भावनाओ और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते है|
 
उन्होंने अपने रचनाओ में ब्रजभाषा का उपयोग किआ हो,जैसे अवधि,राजस्थानी,खरी बोली,और उर्दू फारसी के सब्दो का भी मिश्रण मिलता है|रैदास को उपमा और रूपक अलंकार काफी प्रिय रहे है| उन्होंने अपने पदों में इन अलंकारों का व्यापक प्रयोग किआ है|सीधे सादे पदों में संत कवि रैदास ने ह्रदय को भाव को बरी सरलता से प्रकट किआ है|
 
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मीराबाई से उनका जूराव:

संत रबिदास,मीराबाई के धार्मिक गुरु थे| रैदासा के सिक्षा से वे इतनी प्रभावित होते है की वह रबिदास के अनुयायी बन गई| मीराबाई माँ बाप की एकलौती संतान थी|वे राजस्थान के राजा की बेटी और चितौर की महारानी थी| माता के देहांत के बाद राजकुमारी मीराबाई अपने दादा दादी के पास रहती थी,उनके दादा-दादी ने ही उन्हें संभाला| दादाजी भी संत रबिदास के अनुयायी थे| उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव परा की समाज के लोग खुद ही उनके श्रद्धालु बन जाते थे| अतः मीराबाई भी अपने दादा जी के जैसे रबिदास के सिक्षा से प्रभावित होकर उनके अनुयायी बन गई| मीराबाई अपने दादा जी के साथ रबिदास जी से मिलती रहती थी|विवाह के उपरांत भी मीराबाई ने अपने परिवार की रजामंदी से रबिदास को अपना गुरु माना| मीराबाई अपने गुरु के सन्दर्भ में लिखी है:
 
                                  गुरु मिलिया रबिदास जी|१|
 
                  वर्णाश्रम अभिमान ताज़ी,पद राज बंद ही जासु की|
                    संदेह खंडन-निपन,वाणी विमुल रादैसा की|२|
 
आज भी संत रैदास के उपदेस समाज कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है| उन्होंने अपने रचनाओ के माध्यम से यह प्रमाणित कर दिया की मनुष्य अपने जन्म और व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता बल्कि अपने मन के अन्दर दुसरो के प्रति करुना और दयालु जैसे गुणों से होता है| यह बाते आज भी लागू होती है| इन्ही गुणों लके कारण संत रैदास को अपने समय के समाज में अत्यधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करते है|

 

संत रबिदास जी का सामाजिक कार्य(SANT RABIDAS’S SOCIAL WORK)

लोगो का कहना था की रबिदास भगवान का रूप है जो इस धरती में फैले अन्ध्विस्वसो और भेद भाव को खत्म करने के लिए रैदास के शक्ल में जन्म लिया है| लोगो का मानना था की रबिदास समाज सुधार का काम करने आया है इस धारती पर| रबिदास जब तक बरा होता जातिवाद अपना पाँव समाज में फैला चूका था| उन्होंने बचपन में बहुत से भेद भाव का सामना किया था जिन्हें दूर करने के लिए उन्होंने कलम उठाई थी| उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में फैले जदिवाद,भेद-भाव और उंच नीच को दूर करने का बेरा उठाया| उन्होंने अपने लेखनी के माध्यम से जातीवाद की परिभाषा लोगो तक पहुचाया| 
 
उनका मनना था की इन्सान जाती,धर्म या भगवान पर विस्वास से नहीं बल्कि अपने कर्मो से पहचाना जाता है| रबिदास जी जातिप्रथा के उन्मूल प्रयास करने के लिए जाने जाते है|उन्होंने भक्ति आन्दोलन में भी योगदान दीया| वे कबीर जी के अच्छे दोस्त और शिष्य के रूप में जाने जाते है| उन्होंने छुआ छूत से ग्रसित लोगो को जागरूक किआ अपने दोहों और अपने लेखनि के माध्यम से,और छुआ छूत को खत्म करने का प्रयास किआ|
 
रबिदास को भी इन सामाजिक कुरुतियो का सामना करना परा| उन्हें मंदिर में पूजा करने नहीं दिया जाता था,वो एक छोटी जाती में जन्मे इन्सान थे| अतः उन्हें स्कूल में पढने की अनुमति नहीं थी दुसरे बच्चोकी तरह,| वे जब गावं के बच्चो के साथ खेलने की कोशिस करते तो उन्हें खेलने नहीं दिया जाता था,क्युकी वह छोटी जात के थे| लोग खुद के मकानों में रबिदास को प्रवेस नहीं करने देते थे,और उन्हें कच्चे माकन में रहने की अनुमति दी जाती थी,और भेद भाव किआ जाता था| 
 
अतः इन सभी से उन्होंने निजत पाने की सोची,और छुआ छूत को और भेद-भाव को दूर करने की ठानी और समाज के लोगो को संदेस देना सुरु किआ,अपनी लेखनी के माध्यम से| अतः रबिदास लिखते है:
भगवान ने इन्सान बनाया है न की इन्सान ने भगवान को||
कहने का आशय यह है की  हमें एक दुसरे के प्रति दयालु और नम्रता का भाव रखना चाहिए| कोई भी व्यक्ति अपने जाती,धर्म या भगवान पर विस्वास से नहीं बल्कि अपने कर्मो से पहचाना जाता है| उनका विस्वास था की राम,कृष्णा,करीम,राघव,आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम है,वेद पुराण आदि ग्रंथो में एक ही परमेश्वर का गुणगान किआ है| 
 
रबिदास का विस्वास था की इश्वर की भक्ति के लिए सदचार जरुरी नहीं है| उन्होंने अपने अभिमान को त्याग कर  दुसरो का साथ देने में ज्यादा बल दिया,उनका कहना था:
                              कह रैदास टोरी भागती दुरी है,भाग भरे सो पावे|
                           तजि अभिमान मोती आप पर,पिपिलक हवे चुनी खावे||
 

सिक्ख धर्म में रबिदास के पदों का महत्व:

 
सिक्ख धर्म भारत के नवीनतम धर्मो में से एक है| गुरु ग्रन्थ साहब जो सिक्खों के अंतिम गुरु है उनमे रबिदास के पदों,गानों और चौपईयो का महत्वपूर्ण योगदान है| रैदास के पदों में से 40 पद गुरु ग्रन्थ साहब में मिलते है |जिनका संपादन  गुरु अर्जुन सिंह देव ने 16 वी सदी में किया था| गुरु ग्रन्थ साहिब में उनके द्वरा लिखा गया 40 पवित्र लेख इस प्रकार है: रागा सीरी,गौरी,आशा,गुजारी,सारथ,धनसरी,जेंत्सारी,सूही,बिलावल,गौंड,रामकली,मारू,केदार,भईरुऊ,बसंत और मल्हार इत्यादि है| 
 
रबिदास जी के जयंती में पुरे गावं में रैदास के मानने वाले अनुयायी जुलुस निकलते है,गुरुद्वारों में रबिदास के गानों को बजाय जाता और उन्हें सुना जाता है,पूजा अर्चना और कीर्तनो से उनका भव्य स्वागत किआ जाता है उनके चित्र के आगे सब बैठ के आराधना करते है| लंगर का आयोजन किआ जाता है|
 

संत रबिदास की बीमारी ठीक करने की कहानी:

संत रबिदास को लोग भगवान का दूत मानते थे,लोगो का मानना था की भगवान ने समाज में फैले कुरीतियों को दूर करने के लिए उन्हें धरती में भेजा है|  इससे जूरी एक घटना है की जब रबिदास जी बचपन में पाठशाला में पढ़ते थे,तो उसी पाठशाला में उनके शिक्षक पण्डित शारदा नन्द का पुत्र भी पढ़ते थे| धीरे-धीरे दोनों घनिष्ट मित्र बन गए| एकदिन दोनों छुप्पन छुपी खेल रहे थे,1-2 बार खेलने के बाद रात हो गई,और उन्होंने कहा की अगले सुबह को खेलने की बात कही| अगले सुभ जब रबिदास ने अपने मित्र के साथ खेलने के लिए जाते है,तब वह देखते है की उनका मित्र खेलने नहीं आया| अतः वह अपने मित्र को बुलाने पण्डित जी के घर जाते है, और वहाँ पहुच कर जब रबिदास शारदा नन्द से पूछते है अपने मित्र के बारे में तो पण्डित जी उन्हें अपने पुत्र के पास लेके जाता है जो रबिदास का मित्र था और रबिदास अपने मित्र को देख कर हक्का बक्का हो जाता है और सुन्न पर जाते है,क्युकी उनका मित्र मारा परा होता है|  रबिदास जी के अन्दर बचपन से ही ओलौकिक शक्ति थी,उन्होंने अपने मरे हुए मित्र को यह कहा की चलो यह सोने का वक़्त नहीं है,चलो चलकर खेलते है, और उनका मित्र एकाएक उठ जाता है और खेलने के लिए तैयार हो जाता है| यह देखकर वहा के सरे लोग हक्के बक्के ह जाते है| इससे साबित होता है की उनके पास ओलौकिक शक्तियां थी| 
 
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रबिदास जी के स्वभाव और उनका दयालुपन: 

रबिदास जी इतने बारे पथ प्र्दार्शक होते हुए भी उन्हें भेद-भाव का सामना करना परा था| उन्हें उन्ही के जाती भाई संत रैदास को आगे बढ़ने से रोकते थे| उन्हें तिलक लगाना बहुत पसंद था,अतः एकबार जब उन्होंने तिलक लगाया तब उन्ही के जाती के लोगो ने रबिदास के इस कार्य का खंडन किआ और उन्हें यह सलाह दिया गया की तिलक लगाना,धोती पहनना यह सब उचे जात वाले करते है|
 
संत रैदास ने इन चीजो का खंडन करने की ठान ली थी और उन्हें सुधारने की जिद्द उनके दिलोदिमाग में बैठ चुका था| अतः फिर एक बार कई दिनों तक उन्होने ब्राह्मण के जैसा वेस भूषा पहनना सुरु किआ| वह ब्राह्मणों की बहती जनेऊ धारण करते थे,धोती पहनते थे,तिलक लागाते थे अतः यह कार्य कुछ दिनों तक चलता रहा,और कुछ दिनों बाद गावं के ऊंची जाती के लोगो ने इसका पुरजोर विरोध सुरु किआ,और उनकी गतिविधियों के खिलाफ राजा के सामने शिकायत की|
 
रबिदास जी सभी ब्राह्मणों को आदरपूर्वक मुश्कुराते हुए उत्तर देते है भरी महफ़िल में, और राजा के सामने यह कहते है की सुद्रो के पास भी लाल खून है और ब्राह्मणों के पास भी,सुद्रो के पास भी दिल है और ब्राह्मणों के पास भी,अतः जिस तरह ब्राह्मणों को अधिकार मिलता है उन्हें(सुद्रो) को भी सामान अधिकार मिलना चाहिए|
 
रबिदास का कहना था की जनेऊ पहनने से और तिलक लगाने से किसी को भगवान प्राप्ति नहीं होती है,उनका कहना था की आप सभी को सच्चाई दिखाने के लिए इस गतिविधि को शामिल किया गया|,उन्होंने जनेऊ उतार कर राजा को दे दिया और इसके बाद उन्होंने कभी भी जनेऊ का धारण नहीं किआ और न ही कभी तिलक लगाया|
 
उन्होंने अभिमान और इर्ष्या का खंडन किआ| उनका कहना था की अभिमान शुन्य रहकर काम करनेवाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है| जैसे की बारे से बार हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है,लेकिन लघु शरीर वाला(चींटी) इन कणों को आसानी से चुन लेता है| इसीलिए अभिमान और बरप्पन का भाव त्याग कर विनाम्र्तापुर्वक ध्यान करने वाला मनुष्य ही इश्वर का भक्त होता है| 
 
संत रैदास अपने भक्ति भावना से समाज में हित की भावना और कामना से ओत-प्रोत भरी रचनाओं का निर्माण करते थे,इसलिए उनके श्रोताओंके मन पर गहरा प्रभाव परता था |उनके उपदेसों से लोगो को ईएसआई सिक्षा मिलती थी जिससे लोगो की शंका दूर हो जाती थी,और उन्हें संतोषजनक समाधान मिलते थे और लोग खुद ही उनके अनुयायी बन जाते थे|
 

रबिदास के पिता की मृत्यु की घटना(STORY OF RABDAS’S FATHER DEATH):

एक दिन संत रबिदास अपने घर में बैठे थे,तभी उन्हें पता चलता है की उनके पिता का देहांत हो गया,हालाँकि वे लोग सूद्र जाती के थे अतः रबिदास ने अपने परोशियो से मदद मांगी ताकि वे अपने पिता का अंतिम शंस्कार गंगा नदी के तट पर कर सके,सभी ब्राह्मण उनके खिलाफ थे क्योकि वे शुद्र जाती के थे,उस समय यह प्रथा थी की ब्राह्मण लोग ही गंगा में अंतिम शंस्कर किआ करते थे|अतः शुद्रो के अंतिम शंस्कर से गंगा प्रदुसित हो जाती|
 
याह जानकर गुरूजी रबिदास जी बहुत दुखी हुए और खुद को असहाय मानने लगे,लेकिन उन्होंने अपने संयम नहीं खोयाऔर भगवान से अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए प्राथना करने लगे,फिर वहां एक बहुत बरा तूफ़ान आया और गंगा नदी का पानी विपरीत दिशा में बहने लगा| फिर अचानक पानी की एक बरी लहर मृत शरीर के पास आई और अपने में सारे अवसेश को अवशोषित कर लिया,एसा कहा जाता है तभी से गंगा विपरीत दिशा में बहता है| 
 

मुग़ल शशक बाबर और रबिदास जी का एक अध्यात्मिक रिश्ता:

बाबर मुग़ल साम्राज्य का पहला शसक था,जिसने 1526 में पानीपत का युद्ध जीता था और दिल्ली पर कब्ज़ा करने वाला पहला मुग़ल शशक बना| बाबर गुरु रबिदास जी के अध्यात्मिक शक्ति से बहुत प्रभावित थे और रैदास के बारे में उन्होंने सुना था,और उनसे मिलना चाहते थे| बाबर हुमायूँ के साथ मिलकर गुरूजी से मिलने जाती है,और मुग़ल शशक गुरूजी के चरण कमलो को स्पर्स कर उनका सम्मान करते है| लेकिन गुरूजी उन्हें आशीर्वाद देने से इनकार के देते है,और उन्हें बहुत लोगो के जान लेने के कारन उन्हें दंड देने की बात कहती है| अंत में गुरूजी बाबर को गहराई से सिक्षा देती है,जिससे प्रभावित होकर बाबर संत रबिदास का अनुयायी बन जाते है| इससे साबित होता है की बाबर जैसे शाशक को भी जान लेने के कारन गुरु जी उन्हें दण्डित करते है और उनके सहपाठी के सामने उन्हें डाटते है| इससे उनके नीडर होने का सबुत मिलता है|
 

मन चंगा तो कठौती में गंगा की पूरी कहानी/ कुभ में सिक्के की कहानी:

 

एक बार की बात है पंडित गंगा राम गुरु जी से मिलने के लिए उनके घर पधारे उनसे मिलने के बाद उनका आदर सत्कार किया। वो हरिद्वार में कुंभ उत्सव में जा रहे थे गुरु जी ने जब यह जाना की वह कुम्भ के मेले में जा रहे है तब गुरूजी ने उन्हें एक सिक्का दिया और उनसे कहा कि ये सिक्का आप गंगा माता को चढ़ावा दे दीजियेगा ,अगर वो इसे आपके हाथों से स्वीकार करें। पण्डित जी ने बड़ी सहजता से इसे ले लिया और वहाँ से हरिद्वार के लिए रवाना हो गए। वो हरिद्वार पहुचे और गंगा नदी में दुबकी लगाने चले गए, पण्डित जी वहाँ पर नहाये और बिना गुरु जी का सिक्का गंगा माता को दिये वापस अपने घर लौटने लगे|

 वो जब  राश्ते में आ रहे  थे तो पण्डित जी अपने रास्ते में थोड़ा कमजोर होकर बैठ गये,उन्हें महसूस हुआ कि वो कुछ भूल रहे हैं, वो दुबारा से नदी के किनारे वापस गये और जोर से चिल्लाए माता, गंगा माँ पानी से बाहर निकली और अपने हाथ से उनके सिक्के को स्वीकार किया। माँ गंगा ने संत रविदास के लिये सोने के कँगन भेजे। पंडित गंगा राम घर वापस आये और वो कँगन गुरु जी के बजाय अपनी पत्नी को दे दिया।

एक दिन पंडित जी की पत्नी उस कँगन को बाजार में बेचने के लिये गयी। सोनार चालाक था, सो उसने कँगन को राजा और राजा ने रानी को दिखाने का फैसला किया। रानी ने उस कँगन को बहुत पसंद किया और एक और लाने को कहा। राजा ने घोषणा की कि कोई इस तरह के कँगन नहीं लेगा, पंडित अपने किये पर बहुत शर्मिंदा था क्योंकि उसने गुरुजी को धोखा दिया था। वो रविदास जी से मिला और माफी के लिये निवेदन किया। गुरु जी ने उससे कहा कि “मन चंगा तो कठौती में गंगा” ये लो दूसरे कँगन जो पानी से भरे जल में मिट्टी के बर्तन में गंगा के रुप में यहाँ बह रही है। गुरु जी की इस दैवीय शक्ति को देखकर वो गुरु जी का भक्त बन गया।

 

रबिदास जी की मृत्यु(DEATH OF SANT RABIDAS JI):

गुरु रबिदास जी की सच्चाई,मानवता,भगवान के प्रति उनकी सद्भावना कोदेख उनके चाहने वाले अनुयायी बढ़ते जा रहे थे,लेकिन दुसरे तरफ उनको कुछ लोग मारने का प्रयत्न कर रहे थे,और योजना बना रहे थे| अतः उनके कुछ विरोधियों द्वारा एक सभा का आयोजन किया गया और गुरूजी को आने के लिए आमंत्रित किया गया|| सभा को गावं से दूर आयोजित किया गया| गुरूजी उनके चाल को समझ चुके थे अतः फिर भी वह उस सभा में जाते है और सभा का सुभारम्भ करते है| गलती से सुरुजी की तरह उन लोगो का एक साथी मारा जाता है|
 
कुछ समय बाद गुरूजी अपने कक्ष में जाते है संख बजाते हैओर सब अचंभित हो जाते है,जो लोग गुरूजी के मारने का प्रयत्न करने की कोशिश क्र रहे थे वह समझ जाते है और गुरूजी से क्षमा याचना के लिए जाते है और गुरूजी उन्हें क्षमा कर देते है|
 
उनके अनुययियो का मानना है की रबिदास जी 120 या 126 वर्षो बाद अपना शरीर को त्याग देते है| लोगो के मान्यता के अनुशार 1540 A.D  में वारणसी में उन्होंने अंतिम शंस लिया था|
 

स्मारक जो रबिदास के लिए बनाया गया:

वारणसी में श्री गुरु रबिदास पार्क:

वारणसी में श्री गुरु रबिदास पार्क है जो नगवा में उनके यादगार के रूप में बनाया गया है,जो उनके नाम पर गुरु रबिदास स्मारक पार्क बनाया हाउ|
 

गुरु रबिदास घाट:

वाराणसी में पार्क से बिलकुल सटा हुआ उनके नाम पर गंगा नदी के किनारे नए घाट को लागू करने के लिए गुरु रबिदास के नाम पर गुरु रबिदास घाट भारत सरकार द्वारा बनाया गया है|
 

संत रबिदास नगर:

ज्ञानपुर जिले के निकट संत रबिदास नगर है,जो की पहले भदोही नाम से जाना जाता था लेकिन अब उनका नाम संत रबिदास नगर है|
 

श्री गुरु रबिदास जन्म स्थान मंदिर वारणसी:

इनके सम्मान में इनके जन्म स्थान सर,गिवार्धनपुर,वारणसी में इनके जन्म स्थान पर एक मंदिर रबिदास के नाम पर इनके अनुययियो द्वरा चलाया जाता है|
 

श्री गुरु रबिदास स्मारक गेट:

वारणसी के लंका चोराहे पर एक बार गेट है जो इनके सम्मान में बनाया गया है|
 

कुछ प्रश्न रबिदास(रैदास) जयंती के ऊपर(SOME QUESTION ABOUT RABIDAS JAYANTI)

1.रविदास जयंती का तरीका?

रबिदास जी के जयंती में पुरे गावं में रैदास के मानने वाले अनुयायी जुलुस निकलते है,गुरुद्वारों में रबिदास के गानों को बजाय जाता और उन्हें सुना जाता है,पूजा अर्चना और कीर्तनो से उनका भव्य स्वागत किआ जाता है उनके चित्र के आगे सब बैठ के आराधना करते है| लंगर का आयोजन किआ जाता है|

2.क्या साउथ इंडिया वाले को रविदास जयंती मनाते हैं?

पुरे भारत में इनके अनुयायी फैले है,जो इनके जन्म दिवस पर रबिदास जयंती मानते है|

3. 1982 का रबिदास जयंती की तारीख क्या है?(calendar)

8 फरवरी 1982 को रबिदास जयंत मनाया गया था| 

4.1986 ki ravidas jayanti ka day?

24 फरवरी 1986 को रबिदास जयंती मनाया गया था|

5.Is guru ravidas jayanti dry day in uttarakhand?

नहीं रबिदास जयंती में ड्राई डे सिर्फ दिल्ली में लागु होती है|

6. Guru ravidas ji ki 27 february ko kaun si jayanti manae jayegi?

भारत में इस महान व्यक्ति का जन्म दिवस के मौके पर उनका जयंती मनाया जाता है| भारत में 27 फ़रवरी 2021 को इनका 643 वा जन्मदिवस मनाया जाएगा| 

7.How many countries are going to celebrate Guru Ravidas Jayanti?

पुरे विस्व में जितने भी रबिदास के मानने वाले उनके अनुयायी है सभी रबिदास जयंती मनाते है,लेकिन ज्यादातर भारत में ही इन्हें मनाया जाता है|
 

8.What is date in 1971 Ravidas Jayanti?

10  फरवरी को 1971में रबिदास जयंती माने गया था| 
 

9.What is the the connection between Ravidas Jayanti and Bhim Rao Ambedkar?

दोनों ने जात पात के खिलाफ अपनी आवाज उठाया था,गुरूजी को भेदभाव का सामना करना परा था जो 19 वी सदी में बाबा साहब भीम राव आंबेडकर को भी करना परा था|
 

10 Ravidas jayanti kis tarikh ko milega 2019?

2019 में रबिदास जयंती 19 फरवरी को मनाया गया था|
 

11.Is it holiday declared on eve of Guru Ravidas Jayanti on 19 Feb 2019 in Central
 govt offices?

जी हां 19 फरवरी 2019 में CENTRAL GOVT OFFICES छुट्टी होगी|

संत रबिदास जी के लिए कुछ अंतिम सब्द(SOME WORDS ABOUT SANT RABIDAS JI):

तो दोस्तों ये थी रबिदास जयंती का आर्टिकल,हम इसमें हर छोटी से छोटी चोजो को लिखने की कोशिश की है ताकि हमारे पाठक संत गुरु रबिदास जयंती का इतिहास, जाने 2021 में कब है जयंती?(SANT GURU RABIDAS JAYANTI HISTORY IN 2021) को पूरी जानकारी मिले और उन्हें दुसरे आर्टिकल में जाने की जरुरत न हो| अगर आपको हमारे पोस्ट अच्छा लगा क्यों कृपया इसे फेसबुक इंस्टाग्राम टि्वटर लिंकडइन व्हाट्सएप में शेयर जरूर करें एवं अगर आप किसी प्रकार का सुझाव हमें देना चाहते हैं तो कमेंट बॉक्स में कमेंट जरुर करें

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