BIOGRAPHY OF SWAMI DAYANAND SARSWATI IN 2021 / स्वामी दयानंद सरस्वती को किसने मारने का षड्यंत्र रचा जाने हिंदी में?

लेखक:गुड्डू राय

BIOGRAPHY OF SWAMI DAYANAND SARSWATI IN 2021 / स्वामी दयानंद सरस्वती को किसने मारने का षड्यंत्र रचा जाने हिंदी में?

आज हमलोग देश के महान शक्सियत के बारे में जानेंगे,जिन्होंने अपने जीवन काल में भारत में व्याप्त बाह्य आडम्बरो को खत्म करने की कोसीस की और सफलता प्राप्त की| लोग कहते है की एक व्यक्ति अकेले क्या क्र सकते है लेकिन अगर हर एक व्यक्ति छोटी छोटी सुधार करने की सोचे तो बहुत कुछ बदल सकता है| आज हम  BIOGRAPHY OF SWAMI DAYANAND SARSWATI IN / स्वामी दयानंद सरस्वती को किसने मारने का षड्यंत्र रचा जाने हिंदी में? जाने 2021 में के बारे में जानेंगे| जिससे हमारे पाठको को पूरी जानकारी मिले|

संक्षिप्त में सवामी दयानंद के जन्म  सार और निबंध :

स्वामी दयान्दं सरस्वती का मूल नाम या यु कहे की उनके बचपन का नाम मूलशंकर था| उनका जन्म गुजरात राज्य कठियावर क्षेत्र में एक छोटे से गाँव टंकरा  में 12 फ़रवरी 1824 को हुआ था| इनके पिता का नाम कृष्णलाल जी तिवारी थे और माता का नाम यासोदाबाई था| इनके पिता एक कर-कलेक्टर थे| ब्राह्मण परिवार में जन्मे दयान्दं का बचपन काफी अमीरी में गुजरा| उनके पिता कर कलेक्टर होने के कारन काफी आमिर थे| गाँव के अमिरोमे उनका नाम भी आता था| स्वामी का प्रारम्भिक जीवन खुशहाली से भरपूर था|
वे इस्वर में विस्वास रखने वाले इस्वर भक्त थे,हालाँकि वे ब्राह्मण परिवार से थे इसलिए उनमें इस्वर में भक्ति कुछ ज्यादा ही थी एसा लोगो का मानना है,वे एक मेधावी बालक थे,ब्राह्मण परिवार से होने के कारन पिता के द्वारा उन्हें वेदों का ज्ञान समय समय पर मिलता रहा अतः बालक मूलशंकर को वेदों का पूरा ज्ञान था|पण्डित बनने के लिए संस्कृत,वेदों, श्लोको काअध्ययन लिया|  स्वामी दयान्दं को वेदों की व्यख्यान करते थे,वे जहा भी जाते वेदों का उपदेश देते रहते थे अतः उन्हें लोग ऋषि कहने लगे|

स्वामी दयानन्द की शिवरात्रि की घटना:

बाल्यकाल से ही स्वामी जी के मन में अंग्रेजो के प्रति हिन् भाव की द्रिष्टि  थी, उस समय हमारा  देश अंग्रेजो के आधीन था| अतः ब्राह्मण होने के कारन बालक मूलशंकर(बाल्यकाल का नाम) शिवरात्रि के दिन अपने पिता जी जो पण्डित थे उनके साथ शिवरात्रि के पूजन समाप्ति के बाद घर चले गए और घर जाने के पश्चात उनका पूरा सपरिवार मंदिर में जागरण देखने के लिए चले गए| अतः रात्रि ज्यादा होने के कारन उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण ले लिए मंदिर में ही रुक गए|
जागरण होने के पश्चात बालक मूलशंकर के सारे परिवार के लोग गहरी निद्रा में सो गए| लेकिन बालक मूलशंकर को नींद नहीं आ रही थी,उनका एसा मानना था की भगवान शिव खुद आएँगे मंदिर में रखे प्रशाद ग्रहण करने, अतः भगवान शिव से मिलने की ललक में वह जगा रहा| तत्पश्चात उसने देखा की भगवान शिव के लिए जो भोग रखा गया था उस प्रशाद को चूहा खा रहा है|
यह देखकर वह बहुत आश्चर्य हुआ और मन ही मन सोचने लगा की इश्वर खुद के चढाए प्रशाद की रक्षा नहीं कर सकता तो वह मानवता की रक्षा कैसे करेंगे? इस बात पर उनके अपने पिता से बहस हो गई|उन्होंने कहा की हमें असहाय इश्वर की उपश्ना नहीं करनी|
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जीवन का अर्थ समझने की कोशिस:

जब स्वामी जी बरे हुए,तब उनके साथ एक घटना घटी जिसे उन्हें जीवन के प्रति उनकी आँखे खोल दी| स्वामी सरस्वती अपने पुरे परिवार के साथ रहते थे,उनके परिवार में उनका चाचा भी था, अतः भारत में फैले हैजे के कारन उनके चाचा और उनके छोटे बहन की मृत्यु हो गई,मूलशंकर के पिता के अनंत कोशिशो के बावजूद भी वह अपनी पुत्री और अपने भाई को बचा न सका| अतः उनका मृत्यु के बाद स्वामी जी मृत्यु और जीवन का अर्थ गहराई से सोचने लगे|
स्वामी जी माता और पिता ने उनका विवाह उनके किशोरावस्था के प्रारंभ में करने का निश्चय किया| 19 वी शादी के प्रारंभ में यह आम बात थी,लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने यह निश्चय किया की इन सब चीजो की लिए वह नहीं बना है| अतः 1846 में वे सत्य की खोज के लिए घर से निकल परे|

दयानंद की ज्ञान प्राप्ति:

स्वामी जी ने पुरे भारत का भ्रमण शुरू किया उन्हें अपने जीवन में सत्य का अर्थ खोजना था| उन्होंने पुरे भारत में जहा जहा भी गए अपने ज्ञान की कुंजी साथ लेते गए और वेदों का उपदेस देते गए| वे सन्यासी और वक चिन्तक थे,एक और वे पुरे भारत में वेदों का ज्ञान बाँट रहे थे और दूसरी और जीवन और मृत्यु की खोज में पुरे भारत का भ्रमण कर रहे थे| उनका प्रमुख नारा था वेदों की और लौट| 
 
भारत भ्रमण करते हुए उन्हें मालूम चल गया था की भारत में ऐसे कई सारे आडंबर है जिन्हें दूर करना जरुरी है अतः भ्रमण करते करते वे हरिद्वार के कुम्भ के मेले में पहुचे,जहाँ उन्होंने पाखंड का पताका फहराया और लोगो को आडम्बरो से दूर रहने की हिदायत दी|
उन्होंने भारत भ्रमण करते करते अनेक अनेक शस्त्रार्थ और वेदों का ज्ञान अर्जीत किया| वे कलकत्ता में बाबु केशवचंद्र के संपर्क में आए यही से उन्होंने पुरे वस्त्र धारण करना शुरू किया और हिंदी बोलना प्रारंभ किया|

स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा आर्य समाज की स्थापना:

दयानन्द ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत १९३२(सन 1875) को गिन्गाव मुबई में आर्यसमाज की स्थापना की गुरी परवा के दिन| ओउम्(शंस्कृतिक नाम) को आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है यह समझया|  संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य था| अर्थत शारीरिक,आत्मिक और सामाजिक उन्नति| इस समाज का मुख्य उद्देश्यों में एक था|कई महान विद्वान व्यक्ति ने स्वामी जी के इस समाज की स्थापना का सहयोग किया तो कहियो ने इस समाज का पुरजोर विरोध किया|  उन्होंने कर्म,सिधांत,पुनर्जन्म ब्रह्मचर्य तथा सन्यास को अपने दर्शन के चार स्तम्भ बनाया| उन्होंने वेदों के प्रचार प्रसार और आर्यावर्त को स्वतंत्रता दिलाने के लिए मुंबई में आर्यसमाज की स्थापना की| स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ही 1876 में स्वराज्य का नारा दिया था|
स्वामी दयानन्द के प्रमुख अनुयायियों में लालाहंसराज ने 1886में ;लाहोर में दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की तथा स्वामी स्र्धानंद ने 1909में हरिद्वार के निकट कांगरी में गुरुकुल की स्थापना किया|

स्वामी दयानन्द के धार्मिक विचार :

स्वामी जी को बचपन से ही वेदों का पूरा ज्ञान था,ब्राह्मण परिवार के होने के कारन उन्हें उनके पिता जी समय समय पर वेदों का ज्ञान देते रहे| तत्पश्चात उन्होंने भरत भ्रमण के समय वेदों का ज्ञान अर्जित करते रहे और उनके उपदेशो को लोगो तक पहुचाते रहे| वेदों को छोर कोई एसा धर्मग्रन्थ प्रमाण नहीं है: इस सत्य का प्रचार करने के लिए स्वामी जी ने सारे देश का दौरा करना प्रारंभ किया| इन्होने वेदों का ज्ञान इतना अर्जित क्र लिया था की वे जहा भी जाते थे सारे पण्डित और पेशेवर धर्मगुरु इनसे हार मान लेते थे| उन्होंने शंस्कृत में महारत हाशिल कर लिया था|
उन्होंने हिन्दू धर्म ग्रंथो के साथ एनी धर्म ग्रन्थ जैसे इसाई और मुश्लिम धर्म ग्रंथो का भी अध्ययन किया था| उन्होंने कभी किसी के धर्मो को छोटा या बुरा नहीं कहा बल्कि अपने अनुयाइयो के साथ मिलकर वेदों का प्रचारकरने के लिए शंघर्ष आरंभ किया|उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ मिलकर तीनो मोर्चो में धर्म का प्रचार प्रसार शुरु किया| उनका यह मानना था की वेद में सारे समस्यायों का हल है,पौराणिक ग्रंथो में भी वेदों का ही अंश मिले है|
स्वामी जी सभी धर्मो में व्याप्त जितनी भी बुराई है सबका विरोध कठोर शब्दों में करते थे| सर्व प्रथम उन्होंने हिन्दू धर्मो में व्याप्त  बुरइयो का खंडन किया| हालाँकि वे खुद भी हिन्दू धर्म से ताल्लुक रखते थे,तत्पश्चात उन्होंने हिन्दू धर्मो में व्याप्त बुरइयो का खंडन किया| वे किसी भी धर्म के अनुयायी नहीं थे उन्हें जिस जिस धर्मो  में बुराई दिखी सभी का खंडन करे और कठोर शब्दों में किया| वे शत्य का प्रचार करने वाले स्वामी थे| उन्होंने शत्यार्थ प्रकाश की रचना की,अपने इस महान ग्रन्थ में स्वामी जी ने सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खंडन किया है|
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स्वामी जी द्वरा किये गए  समाज  सुधार के कार्य और शिक्षा में योगदान :

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने की भरपूर कोसिस की| उन्होंने तत्कालीन  समाज में व्याप्त रुढियो,अन्ध्विस्वासो और पखंदो का खंडन पुरजोर शब्दों में किया| जिसके कारण उन्हें सन्यासी योद्धा कहा जाने लगा| उन्होंने अपने बाल्यकाल से ही संत गुरु रबिदास (Sant Guru Rabidas) की तरह जाती प्रथा का पुरजोर विरोध किया|
उन्होंने हमेसा कर्म के आधार पर वर्ण का निर्धरित होने चाहिए जैसी  बात कही| अर्थार्त भेदभाव और छुआ-छूत को दूर करने के लिए उन्होंने कर्म को हमेसा ऊपर रखा न की जात-पात को| उन्होंने हमेसा दलितों के पक्ष में रहने की ठानी वे हमेसा उनके पक्षधर रहे और उनसे किये गए छुआ-छूत का खंडन करते रहे|
उन्होंने स्त्रियों को समान अधिकार देने की बात कही,और उनकी शिक्षा के लिए आन्दोलन चलाया ताकि स्त्रियों और लारकियो को भी समान अधिकार और सामान शिक्षा प्राप्त हो| ये वर्तमान समय में भी लागू होता है और स्त्रियों के अधिकार हेतु हमलोग महिला दिवस (Womens Day) को मनाते है|
उन्होंने बाल विवाह और सटी प्रथा का विरोध किया और विधवा विवाह का समर्थन किया| स्वामी दयानन्द जी तैत्र्वाद के समर्थक थे| उन्हें वेद का पूरा ज्ञान था अतः वे वेद के आधार को सर्वव्यापी मानते थे|  वे योगी थे और योगसाधना में विश्वास करते थे| वे समाज में व्याप्त सभी वर्णों स्त्री पुरुषो के समानाधिकार के पक्षधर थे| वे जहा भी जाते थे अपने अनुयायियों को शिक्षा देते रहते थे| उनके शिक्षा में देस्भक्ति,दूरदर्शी,और युगानुकुल के विशेष शिक्षा मिलती थी|
वेसे तो वे स्न्याशी थे लेकीन उनके अन्दर प्रचंड राष्ट्रवादी और राजनैतिक ज्वाला थी और अंग्रेजो के प्रति बेहद क्रोध था| वे हमेशा वेदेशी फुट डालो की निति का विरोध करते थे| दो भाई आपस में लरते है तो तीसरा बैठ मजा लेने के विरोधी थे| उन्होंने ग्रंथो के आधार पर न्याय व्यवस्था का पक्षधर था|

स्वराज्य के शंदेसवाहक:

स्वामी दयानन्द ने सर्वप्रथम स्वराज्य कि बात कही थी| वे अंग्रेजो के फुट डालो की निति का हमेशा से खंडन किया| उनका अंग्रेजो के प्रति अलग ही आक्रोश था जिसे वे पुर्न स्वराज्य के रूप में हाशिल करना चाहते थे|  स्वामी दयानन्द सरस्वती को आर्य समाज के संस्थापक के रूप में जानते है लेकिन राष्ट्र स्वतंत्रता के लिए दिए गए उनके भुमिका को बहुत कम लोग ही जानते है|
स्वामी दयानन्द  सरस्वती जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से पुरे भारत को यह सन्देश पहुचाया था की आर्य,आर्य्वातियो का है अर्थात भारत भरतीयो का है|  1857 की क्रांति का सम्पूर्ण योजना और कार्यपालन में स्व्वामी जी का ही हाथ था| वे अपने प्रवचनों से श्रोताओ के अंदर राष्ट्रवाद की भावना का बिज बो रहे थे|
1855 में जब वे हरिद्वार में कुम्भ के मेला में अपने अनुयायियों को संबोधित करने केलिए स्वामी जी आबू पर्वत से हरिद्वार पैदल यात्रा किये थे| सारे रश्ते चलते चलते वे प्रवचन देते गए और भारत की रुख को टटोला अंग्रेजो के प्रति|

देश की प्रथम स्वाधीनता संग्राम में स्वामी दयानन्द का योगदान:

 यूँ तो स्वामी जी के बारे में लोगो की यही धरना थी की वे एक साधू सामान थे,लेकिन बहुत कम लोगो को यह पता होगा की स्वामी ने प्रथम स्वाधीनता संग्राम इ अपना भरपूर योगदान दिया था| व मंगल पाण्डेय और धान सिंह गुर्जर के समकालीन थे|  जब वे हरिद्वार पहुचे और एकांत कही बैठे थे तब उनकी मुलाकात ऐसे पांच व्यक्ति से हुई जो आगे चलकर 1857 की क्रांति के मूलाधार बने|  ये पांच व्यक्ति थे: नाना साहेब,अजीमुल्ला खां,बाला साहब,तात्या टोपे तथा बाबु कुवर सिंह ये इनके भी समकालीन माने जाते है|
बातचीत के दौरान ही उइन्होने तय किया की फिरंगी सरकार के विरुद्ध सम्पूर्ण देश में क्रांति की तैयारी की जाए,और एक निश्चित दिन देश में क्रांति का बिगुल बजाय जाए एसा निर्णय लिया गया| आम भरतीयो तक इस क्रांति की आवाज पहुचाने के लिए उन्होंने रोटी और कलम योजना तैयार की| इस पुरे क्रांति की योजना स्वामी जी का था| विचार विमर्श के बाद स्वामी जी हरिद्वार में रुक गए और बाकी के पांचो निति के अनुसार अपने अपने जगह के लिए प्रस्थान ले लिए|
स्वामी जी ने वहा साधू संयाशियो के साथ मिलकर एक गुप्तचर संगठन का आयोजन इन्द्रप्रस्थ(दिल्ली) के एक मंदिर में किया जिसने आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई,उनमे जितना भी साधू संत थे सभी ने क्रांतिकारियों का सन्देश एक स्थान से दुसरे स्थान तक ले जाते थे|
स्वतंत्रता संग्राम जब असफल हो गया तब भी स्वामी जी निराश नहीं हुए | उन्हें यह बात अच्छे से पता था की स्वतंत्रता एक बार में हाशिल कभी नहीं हो सकती | अतः 1855 के योजना में हरिद्वार ने बाबू कुंवर सिंह ने स्वामी जी से आन्दोलन की असफलता की बात कही,तब स्वामी जी ने कहा संग्राम कभी असफल नहीं होता| भरत धीरे धीरे 100 वर्षो में गुलामी की बैरियो में जकरा गया है उसी तरह इसे स्वतंत्र होने में भी 100 वर्ष लग जाएँगे| और सभी से निराश न होने की बात कही|

दयानंद द्वारा गुरु की प्राप्ति :

1857 में क्रांति के असफल हो जाने के दो वर्ष बाद स्वामीजी विरजानंद को अपना गुरु बनाया और उनसे दीक्षा ली| गुरूजी के आश्रम में रहकर उन्होंने वेदों का ज्ञान अर्जित किया,और अपने गुरु के निर्देसनुसार अपने ज्ञान के प्रचार प्रसार में जुट गए| इसी से प्रेरित होकर उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की और अनेकोसमाज सुधार हेतु कार्य किये|
छुआ-छूत ,सती प्रथा,बाल विवाह,नर बलि,धार्मिक संकीर्णता तथा अन्ध्विस्वासो के विरुद्ध उन्होंने जमकर प्रचार किया ओए विधवा विवाह,धार्मिक उदारता तथा आपसी भाईचारे का समर्थन किया| इनके साथ साथ इन्होने लोगो में देशभक्ति की भावना भरने का काम किया|
प्रारंभ में उनके कार्यो से लोग असंतुष्ट थे और उनके कार्यो में विघ्न डालते थे,अतः स्वामी जी ने तर्क द्वारा लोगो को समझान सुरु हुआ और उनकी बधाएकम होती गई|
BIOGRAPHY OF SWAMI DAYANAND SARSWATI IN 2021 / स्वामी दयानंद सरस्वती को किसने मारने का षड्यंत्र रचा जाने हिंदी में?

दयानन्द की हत्या का षड्यंत्र :

स्वामी दयानन्द सरस्वती की मृत्यु जिन परिस्थितिओ में हुई उनसे यह पता चलता है की उनकी मृत्यु साधारण नहीं थी| उनकी देश प्रेम और राष्ट्रप्रेम की भावना ब्रिटिश सरकार के आँखों में आ गई थी| स्वामी जी की मृत्यु 30 अक्टोबर 1883 को दीपावली के दिन संध्या को हुई थी| उस समय वह जोधपुर के राजा ज्जस्वंत सिंह द्वारा आमंत्रित किये जाने पर उनके पास गए थे|  रजा जसवंत सिंह के महलो में अक्सर स्वामी जी के प्रवचन होते रहते थे|  वह पर उनकी नजर नन्ही नामक वैश्या पर गई,उसका हस्तक्षेप रजा जसवंत सिंह पर काफि ज्यदा था| स्वामी जी को यह बात बहुत बुरा लगा| और महाराजा को उससे दूर रहने की सलाह दी|
महाराज स्वामी जी का बहुत सम्मान करते थे और उनका बातो का आदर पूर्वक स्वीकार करते थे|  अतः रजा ने स्वामीजी की बाते स्वीकार कर ली और नन्ही से अपने सरे सम्बन्ध तोर लिए और उनको  को  महल से निकल दिया गया| नन्ही वैश्य को यह बात पसंद नहीं आई और वह स्वामीजी के विरुद्ध हो गई|
उसने स्वामी जी की रशोई में जगन्नाथ नमक व्यक्ति को अपने साथ मिला लिया,और स्वामी जी के दूध में पिसा कांच दाल दिया| थोरी देर बाद स्वामी जी के पास आकार अपनी गलती स्वीकारी और उसने क्षमा की भिक मांगी| स्वामी जी का उदार ह्रदय होने के कारन जगन्नाथ को पुलिश किसी तरह तंग न करे अतः राह खर्च के लिए उन्हें पांच सौ रूपये दिए| बाद में जब भारती करवाया गया तो वहां सम्बंधित चिकित्सक भी शक के दायरे में आया| उन पर आरोप था की वह दवा के नाम पर स्वामी जी को हलकी हलकी विश पिलाते रहे और स्वामी जी की अश्प्ताल में तबियत ज्यादा खराब होने के कारन उन्हें बचाया न जा सका|

FAQ(FREQUENTY ASKED QUESTIONS)

1. स्वामी दयानन्द सरस्वती किसके समकालीन थे?
= स्वामी जी दयानन्द सरस्वती धान सिंह तोमर,तात्या टोपे,अजीमुल्ला खान,बाला साहब,नाना साहेब,और बाबु कुवर सिंह के समकालीन थे|
2.स्वामी दयानन्द सरस्वती योग क्षेत्र में योगदान?
= स्वामी जी भारत में वेदों और उपनिषदों के हमेसा से पक्षधर रहे है| उन्होंने योग को अपने जीवन में लागु किया था उन्हें आय दिन प्राणायाम करते देखा जाता था| अतः योग के क्षेत्र में भी स्वामीजी का अहम् योग्दान है|
3.स्त्रियों के शिक्षा में स्वामी जी काक्या योगदान रहा है?(WHAT WAS THE CONTRIBUTION OF SWAMI DAYANAND SWARASWATI IN WOMEN EDUCATION?
= स्वामी जी ने भारत में व्याप्त कुरीतियों को हमेसा से विरोध किया है| उन्होंने स्त्रियों को समान अधिकार देने की बात कही,और उनकी शिक्षा के लिए आन्दोलन चलाया ताकि स्त्रियों और लारकियो को भी समान अधिकार और सामान शिक्षा प्राप्त हो| ये वर्तमान समय में भी लागू होता है और स्त्रियों के अधिकार हेतु हमलोग महिला दिवस (Womens Day) को मनाते है|
4.किस घटना के बाद स्वामी जी ने अपना घर त्याग दिया?
=जब स्वामी जी बरे हुए,तब उनके साथ एक घटना घटी जिसे उन्हें जीवन के प्रति उनकी आँखे खोल दी| स्वामी सरस्वती अपने पुरे परिवार के साथ रहते थे,उनके परिवार में उनका चाचा भी था, अतः भारत में फैले हैजे के कारन उनके चाचा और उनके छोटे बहन की मृत्यु हो गई,मूलशंकर के पिता के अनंत कोशिशो के बावजूद भी वह अपनी पुत्री और अपने भाई को बचा न सका| अतः उनका मृत्यु के बाद स्वामी जी मृत्यु और जीवन का अर्थ गहराई से सोचने लगे|
स्वामी जी माता और पिता ने उनका विवाह उनके किशोरावस्था के प्रारंभ में करने का निश्चय किया| 19 वी शादी के प्रारंभ में यह आम बात थी,लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने यह निश्चय किया की इन सब चीजो की लिए वह नहीं बना है| अतः 1846 में वे सत्य की खोज के लिए घर से निकल परे|

कुछ अंतिम शब्द स्वामी दयानंद सरस्वती के लिए:

तो ये थी BIOGRAPHY OF SWAMI DAYANAND SARSWATI IN 2021 / स्वामी दयानंद सरस्वती को किसने मारने का षड्यंत्र रचा जाने हिंदी में? जिसमे हमने हर एक बारीकिया देने की कोशिस की है जिससे हमारे पाठको को किसी दुसरे आर्टिकल में जाने कि जरुरत न हो|
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